क्या गैर मुस्लिम जन्नत में जा सकता है?
बहेसियते कुरआन हकीम के तालिब ए इल्म जिस बात के हम कायल हैं वो ये है कि कम अज़ कम तीन चुनिंदा और बुनियादी हकाएक ऐसे हैं जिनका शऊर हमारी फितरत में जुड़ा हुआ यानी चस्पा कर दिया गया है। इन हकाएक के अंदर हर साहबे अक्ल शख़्स उसके अपने हालात व मवाके के मुताबिक जवाब देही ज़रूर होगी। इन तीन बुनियादी हकाएक का शऊर हमें भीतर से ही मिल जाता है।
इसके अलावा जो बाकी हकाएक व आमाल हैं जैसे फरिश्तों पर ईमान, रिसालत पर ईमान, शरई अहकाम व इबादात की अदायगी वगैरह। इन की जवाबदेही पैग़ाम पहुंचने और वाज़ेह होने के साथ शर्त है। वजह वही कि इन सब का शऊर हमें अपने अंदर से नहीं बाहर की मालूमात से हासिल होता है।
ये तीन हकाएक कौन से हैं? इन का बयान कम अज़ कम दो जगहों पर कमो बेश एक से अल्फ़ाज़ में किया गया है। सूरेह अल बकरा की आयत 62 (और सूरह मायदा की आयत 69) मुलाहज़ा कीजिए:
"जो लोग मुसलमान हैं या यहूदी या ईसाई या साबीइन (यानी कोई शख़्स किसी कौम व मज़हब का हो) जो अल्लाह (यानी एक ख़ुदा) और रोज़े कयामत (यानी आमाल की जज़ा व सज़ा) पर ईमान लाएगा, और नेक अमल करेगा, तो ऐसे लोगों को उन (के आमाल) का सिलाह ख़ुदा के यहां मिलेगा और (कयामत के दिन) उनको ना किसी तरह का खौफ़ होगा और ना वो गम नाक होंगे"
गोया अहले ईमान के साथ तमाम दीगर मौजूदा मज़ाहिब के जिम्मेदारों को एक कतार में खड़ा करके कहा जा रहा है कि जो नीचे दर्ज तीन बातों पर ईमान लाएगा और उसके मुताबिक अमल करेगा, उसे रोज़ कयामत ना कोई खौफ़ होगा ना ही कोई गम। ये वो तीन अकाएद हैं जो इस्लाम का पैगाम ना पहुंचने के बावजूद हर इंसान को मानने होंगे। चाहे उसका ताल्लुक किसी भी मज़हब या तबकह फिक्र से हो;
1- एक ख़ुदा पर ईमान
2- सज़ा व जज़ा पर ईमान
3- नेक अमल
अब सवाल ये पैदा होता है कि बिना इस्लाम का पैगाम पहुंचे उन तीन बातों पर ईमान व अमल का तकाज़ा क्या ज़्यादती नहीं? तो हरगिज़ ज़्यादती नहीं है। वजह वही जो हमने इब्तिदा में ही बयान किए कि इन तीनों बातों का अहसास व शऊर हमारी फितरत में जुड़े हुए हैं। गोया इन तीनों बातों को मानने और अमल करने के लिए आप तक किसी मज़हब, शरीयत, किताब या रसूल का पहुंचना ना पहुंचना ज़रूरी नहीं। किताब अल्लाह इस लिहाज़ से सिर्फ आपको याद दिहानी (ज़िक्र) करवाती है और याद दिहानी उसी बात की करवाई जाती है जो अपनी हकीक़त के ऐतबार से आप पहले से जानते हों। इन तीनों बातों का एक मुख्तसर सा जायेज़ा ले लेते हैं की किस तरह ये हमारी फितरत में पहले से मौजूद है? अगर नहीं, फिर तो ये ऐसा है कि एक शख़्स को प्यास ना लगी हो और आप ज़बरदस्ती उसे पानी पिलाने लगें। ऐसे में उसका जिस्म पानी उगल देगा क्यूंकि उसमें तलब (ज़रूरत) ही नहीं है।
1- एक ख़ुदा पर ईमान
सबसे पहली शर्त अल्लाह पर ईमान यानी एक ख़ुदा पर ईमान। जायज़ा लीजिए कि क्या वाकई इंसान में एक ख़ालिक की प्यास है? क्या उसकी फितरत अपना परवरदिगार तलब करती है? तारीख़ इंसानी इस बात पर गवाह है की इंसान ने हर दौर में और हर इलाके में एक बर्तर (सुपीरियर) हस्ती के तसव्वुर को तस्लीम किया है।
एक साबित शुदा चीज़ को साबित नहीं किया जाता बल्कि उसके रद करने वालों से इस्तदलाल (दलील/सबूत) तलब किया जाता है। इंसानियत की अदालत ने तारीख़ी ऐतबार से ख़ुदा के वजूद में पेश किए जाने वाले मुकदमे को कबूल किया है, अब आप लाख उन सबूत व दलाएल का इंकार करें, इस तारीख़ी सच को बदलने की आपकी हैसियत नहीं है। ये दावा इंसानियत ने हर दौर में इजतेमाई (कलेक्टिवली) हैसियत से कबूल किया है, अब अगर कुछ सर फिर उठते हैं और इंसानियत के इस मुत्तफिक फैसले को रद करते हैं तो उन से पूछा जाएगा कि दलील पेश करें। ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसे कि इंसान ये खूब जानता है कि ममता का जज़्बा मां में इलहामी तौर पर ख़ुद बा ख़ुद जुड़े हुए हैं, इसका इज़हार मुख्तलिफ माहोल में मुख्तलिफ तरीके से हो सकता है मगर इस जज़्बे का फितरी होना सबको कबूल है। इस तरह एक ख़ालिक का तसव्वुर हमेशा हर माहोल में इंसानियत का एक आम सरमाया रहा है, उसे कभी अल्लाह, कभी ख़ुदा, कभी गॉड, कभी परमात्मा और कभी आसमानी बाप कह कर पुकारा गया। हद तो ये है कि आज का जदीद ज़हन जिसे ख़ुदा के तसव्वुर से भी एलर्जी है, वो भी आज "सुप्रीम इंटेलिजेंस" या "कलेक्टिव काॅशिंयसनस" जैसे दिलफरेब इस्तिलाहात ईजाद करके उसकी तौजीह (वजह ज़ाहिर करना) पेश करता नज़र आता है। नाम जो भी दें मगर एक बरतर हस्ती के तसव्वुर को इंसानियत ने हमेशा आगे बढ़ कर कबूल किया। "कह दो कि उसे अल्लाह कहकर पुकारो या रहमान कहकर, जिस नाम से भी पुकारो, सारे अच्छे नाम उसी के हैं" (बनी इसराईल, 110)। तसव्वुर ख़ुदा की कोंपल फितरत की गोद में परवान चढ़ते ही ये अंदर से बाहर का सफर करती है। यही वजह है कि एक बच्चा चाहे वो अमेरिका में पैदा हुआ हो या भारत में, चीन से ताल्लुक रखता हो या अफ्रीका के ज़ूलु कबीले से... वो अपने वालीदैन से ये सवाल कर ही देता है कि मुझे किसने पैदा बनाया? या मैं कहां से आया?
आप उसे कहते हैं कि मैंने तुम्हें दरख़्त से तोड़ लिया या एक फरिश्ता हमें दे गया या मार्केट से खरीद लिया। आप उस बच्चे को मुत्मईन करने के लिए जो भी जवाब दें, मगर उसका ये मासूम सवाल इस हकीकत का ऐलान कर रहा है कि ख़ुदा के वजूद की तलब इंसान के अंदर फितरी तौर पर मौजूद है। इंसानी रवय्यों पर की जाने वाली बहुत सी तहकीकात, वो सब यही बताती हैं कि इंसान में फितरी व कुदरती तौर पर ऐसे दावे मौजूद हैं जो उसे एक ख़ुदा पर ईमान रखने पर आमादा करते हैं। तहकीक में ये भी बताया गया कि सख़्त तरीन मुल्हिद (नास्तिक) भी इंतेहाई मुश्किल हालात में बगैर अपनी मर्ज़ी के एक बर्तर हस्ती को पुकार उठता है। गोया इंसान इलहामी (आसमानी) पैग़ाम ना पहुचनें पर या इलहामी पैगाम ना वाज़ेह होने पर मज़हब का इंकार तो कर सकता है मगर ख़ुदा के वजूद का नहीं। कुरआन हकीम के बयान के मुताबिक उस ज़िंदा बर्तर हस्ती के वजूद की गवाही हम सब इंसानों की फितरत व ज़िन्दगी हमें हर पल याद दिहानी करवाती है। उस मुकालमे का अहसास हमारी जिस्मानी याददाश्त से ज़रूर मिटा दिया गया है मगर हमारी रूह और फितरत आज भी पुकार पुकार कर हमें हमारा जवाब याद दिला रहे हैं। सूरेह अल-अराफ की 172 आयत मुलाहजा हो:
"और ऐ नबी (स०), लोगों को याद दिलाओ वो वक़्त जबकि तुम्हारे रब ने बनी आदम की पुष्त से उनकी नस्ल को निकाला था और उन्हें ख़ुद उनके ऊपर गवाह बनाते हुए पूछा था "क्या मैं तुम्हारा रब नहीं हूं?" उन्होंने कहा, "ज़रूर आप ही हमारे रब हैं, हम इस पर गवाही देते हैं" ये हमने इसलिए किया कि कहीं तुम कयामत के रोज़ ये ना कह दो कि "हम तो इस बात से बेख़बर थे।"
2- सज़ा व जज़ा पर ईमान
दूसरी शर्त मौत के बाद ख़ुदा के सामने अपने आमाल की जवाबदेही का अहसास है। ये तकाज़ा भी इंसान के अंदर मौजूद है कि अच्छाई का बदला अच्छा और बुराई का बदला बुरा निकलता है। इंसान बचपन से ही ये चाहता है कि उसकी अच्छाई या कामयाबी को सराहा जाए और कोई ज़्यादती करे तो उसे सज़ा दी जाए। इसी को मद्देनज़र रख कर वालिदैन से लेकर उस्ताज़ह तक इनाम की लालच और सज़ा का खौफ बतौर आज़माए हुए तरीके की तरह इस्तेमाल करते हैं। यही तकाज़ा है जिसकी बुनियाद पर इंसान अदालत से लेकर पुलिस तक निज़ाम कायम करता है। जेल समेत बाकी साज़ाओं का निफाज़ करता है।
इस दुनियां में मुकम्मल इंसाफ का तसव्वुर भी नामुमकिन है। यहां तो तजुर्बा व नज़ारा ये है कि ज़ालिम ताकत व इक्तिदार के नशे में चूर रहता है और मज़लूम, ज़ुल्म सितम की चक्की में पिसता ही जाता है। यहां अक्सर हराम खाने वाला अय्याशियों का मज़ा लूटता है और महनत कश पर ज़िन्दगी की बुनियादी ज़रूरियात भी तंग हो जाती है। कितने ही मुजरिम, फसादी और कातिल किसी अदालत की पकड़ में नहीं आते। एक मिसाल लिए, अगर एक बूढ़ा शख़्स किसी नौजवान को कत्ल कर देता है और मान लिए कि वो पकड़ा भी जाता है। अदालत उसे उसके जुर्म की बुनियाद पर सज़ाए मौत भी नाफिज़ कर देती है। अब सवाल ये है कि क्या ये वाकई इंसाफ है? कहने को तो कातिल को कत्ल के बदले कत्ल कर दिया गया। मगर क्या यही इंसाफ की मुकम्मल सूरत है? कातिल तो एक बूढ़ा शख़्स था, जो अपनी ज़िन्दगी गुज़ार चुका था, जबकि कत्ल होने वाला एक नौजवान था, उसकी पूरी ज़िन्दगी उसके सामने थी। मुमकिन है कि उसकी अचानक मौत से उसकी बीवी बेघर हो जाए, उसके यतीम बच्चे बाप का साया ना होने से गुमराही, आवारगी इख्तियार कर लें। क्या यही हकीक़ी इंसाफ है? ज़ाहिर है कि नहीं। यही वो सुरतेहाल है जो इंसान में फितरी व अक्ली तकाज़ा पैदा करती है कि कोई ऐसी दुनियां व अदालत बरपा हो जहां इंसाफ अपने मुकम्मलतरीन दर्ज में हासिल हो। जहां बुरे को उसकी बुराई का और नेक को उसकी नेकी का पूरा पूरा बदला मिल सके। दीन इसी अदालत की खबर 'रोज़ हश्र' के नाम से देता है। अब कोई इसे जन्नत जहन्नम, नर्क सवर्ग पुकारे, हैवेन हेल का नाम दे, मोक्ष, निर्वाण या फिर पुनर्जन्म से उसको ज़ाहिर करे। सब दर हकीक़त उसी 'जवाब देही के अहसास' यानी 'सेंस ऑफ़ अकाउंटेबिलिटी' के रूप हैं।
इंसान की फितरत ऐसी है कि वो मजमुई (सम्पूर्ण) ऐतबार से कभी भी नामुमकिन का तकाज़ा नहीं करता। यानी वो ये दुआ हरगिज़ नहीं करता उसके दो की जगह चार हाथ निकल आए, वो ये तमन्ना नहीं रखता की कश! दो और दो चार ना होते बल्कि पांच होते। मगर क्या ये अजीब नहीं है? कि यही इंसान फितरी तौर पर तमन्ना रखता है कि उसे मौत ना पकड़े, वो हमेशा की ज़िन्दगी जिए। उसे बीमारी ना सताए, वो हमेशा सेहत से भरपूर रहे। उस पर बुढ़ापा ना सवार हो, वो हमेशा जवानी के उमर में रहे। ये तकाज़ा इसलिए हमारी फितरत में मौजूद है कि भले इस दुनियां में इनकी ताबीर ना मुमकिन महसूस हो लेकिन एक और दुनियां ऐसी ज़रूर सजाई जाएगी जहां इन फितरी तकाज़ों को पूरा किया जाएगा। दीन उस दुनियां की बशारत (खुशखबरी) देता है।
3- नेक अमल
अच्छाई और बुराई की समझ भी हमारी फितरत में पहले से मौजूद है। सूरेह अल-शम्श में इरशाद बारीताला है: "हमने इंसान को उसकी अच्छाई व बुराई को इलहाम कर दिया है।" गोया अच्छाई व बुराई की समझ हम सब इंसानों में मौजूद है। यही वजह है कि पूरे इंसानियत की तारीख़ देख लीजिए बगैर तकसीम रंग, नस्ल, मज़हब आपको नज़र आयेगा कि इंसान हमेशा ये जानता है कि सच बोलना अच्छा और झूठ बोलना बुरा है। किसी मज़लूम की मदद करना, किसी रोते को हंसाना, किसी भूखे को खिलाना आला खूबियां और किसी का हक़ मारना, ना हक़ कत्ल करना, किसी को दुख देना बुरे आमाल हैं। दुनियां भर का जस्टिस सिस्टम कुछ मुआशरती इकदार (सामाजिक मूल्यों) के अलावा अपनी असल में उन ही मूल्यों, सिद्धांतो से निकलने वाले जज़्बात का बयान है। ये अलबत्ता सच है कि इलहामी किताब हो या बाकी फलसफे इनसे इज़ाफ़ी आमाल व फैसले भी इसी फेहरिस्त में शामिल होते जाते हैं।
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काफ़िर ऐसे शख़्स को कहते हैं, जिसे दीन की दावत पेश की जाए, वो हक़ जान ले, मगर अपनी अना, तकब्बुर और तास्सुब की वजह से उस दावत का इंकार करदे, उसे झुठला दे। ऐसे लोगों को काफ़िर कहा जाता है। जैसे कुफ्फारे मक्का ने हक़ को जानते बूझते झुठला दिया। और ये शान सिर्फ नबी व रसूल को अता होती है, क्यूंकि उनकी दावत सबसे मुकम्मल और बेहतर होती है। और अंबिया व रसूलों का राबता अल्लाह से होता है, और अल्लाह बता देता है, कि सामने वाला शख़्स जो दीन की दावत को झुठला रहा है, वो जानते बूझते झुठला रहा है या अभी उसे समझ नहीं आयी इसलिए अभी कबूल नहीं कर रहा। खालिद बिन वलीद की मिसाल ले लिए, वो ना समझी में झुटला रहे थे, उन्होंने रसूल स० के दांत मुबारक भी शहीद किए, लेकिन अल्लाह ने उन्हें हिदायत दी। क्यूंकि वो अभी समझ नहीं पाए थे। दूसरी तरफ अबू जहल और अबू लहब ने जानते बुझते झुटलाया था इसीलिए उन्हें अज़ाब मिला। आज हम जब किसी को दावत देंगे, तो हमें ये मालूम नहीं हो सकता कि सामने वाला शख़्स जानते भूझते झुठला रहा है, या उसे अभी बात समझ नहीं आयी। हमारे पास ख़ुदा की वही नहीं आयेगी, हम उसके दिल का हाल नहीं जान सकते। हमें नहीं पता कि वो अबू जहल की तरह झुठला रहा है या अभी उसका हाल खालिद बिन वलीद जैसा है। लिहाज़ा हम उसे काफ़िर नहीं कह देंगे। बस ये कह देंगे की ये हमारे गिरोह(मुस्लिम) में शामिल नहीं है, गैर मुस्लिम है।
क़ुफ्र का इस्तेमाल
-सीरतुन्नबी के मुताल्ले से मुतल्लिक-
रिसालत के साथ ही ये फरमान ख़ास है कि लोग अगर रसूल स० की दावत का इंकार अपने तास्सुब व तकब्बुर की बिना पर करदें, तो उन पर क़ुफ्र का इस्तेमाल कर दिया जाता है, यानी काफ़िर करार दे दिया जाता है।
ये एजाज़ रिसालत का है, जो ख़त्मे नबुवत के साथ ख़त्म हो गया।आज जो लोग मुसलमान नहीं हैं उन्हें गैर मुस्लिम कहा जाएगा, काफ़िर नहीं। लिहाज़ा कोई आलिम अगर गैर मुस्लिमों को दीन की दावत दे, और वो लोग उस दावत को कबूल ना करे, तब भी वो लोग गैर मुस्लिम ही रहेंगे, काफ़िर नहीं कहलायेंगे।
लोगों पर कुफ्र का इस्तेमाल करना सीरतुन्नबी के नबुवत व रिसालत का पहलू है जिसे गैर नबी (यानी हम लोग) अपने हाथ में नहीं ले सकतें।
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-सीरतुन्नबी के मुताल्ले से मुतल्लिक-
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी हयाते मुबारका में सिर्फ नबुवत व रिसालत के मंसब(ओहदे) पर ही फायज़(पहुंचने वाले) नहीं थे। बल्कि एक अरसा आप स० मक्का के शहरी रहे, फिर रियासते मदीना के हाकिम भी बने। दीन के पहले आलिम भी थे। और ज़ाती शख्सियत में मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह भी।
बतौर नबी और रसूल, आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जो इकदामात(रास्ते अपनाए) किए, उन्हें पढ़ कर अगर वही इकदामात ग़ैर नबी यानी, हुक्मरान, उल्मा या आवाम करने लगे तो ये दीन की दुरुस्त समझ नहीं है। ऐसे इकदामात ख़ालिस नबुवत की खु़सूसियत है। जो ख़त्मे नबुवत के साथ ख़त्म हो गए। आवाम के लिए रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के मक्के की शहरी ज़िन्दगी उस्वा हस्ना है। बतौर हाकिम किए गए इकदामात, आज आवाम और आलिम करने लगें तो ये भी दीन का निहायत ग़लत फहम है।
इसी तरह ज़ाती शख्सियत (मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह) के लिहाज़ से किए गए मामलात को दीन और सुन्नत करार देना भी फहम की ग़लती होगी।
रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने जंग (जिहाद) का फैसला बतौर हुक्मरान किया था। आज अगर कोई आलिम, या कोई जमात लोगों को हथियार पकड़वा दे, और किसी जगह "जिहाद" करने का ऐलान कर दे, और साथ ये कहे कि मैं नबी स० के उसवा हस्ना पर अमल कर रहा हूं, तो ये दीन की ग़लत ताबीर है। क्यूंकि इस जमात या आलिम के पास इक्त़िदार नहीं है।
लिहाज़ा जब तक किसी जमात या आलिम को इक्त़िदार(हुक्मरानी) हासिल नहीं होती, उसे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हयाते मुबारका के शहरी पहलुओं को रोल मॉडल बना कर अपनी कोशिश करनी चाहिए। तालिबान, दाईश और हर कुछ अरसे बाद कानून तोड़ने वाली तहरीकों का चलना दीन की ऐसी ही गलत ताबीर की वजह से होता है।
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