सत्यार्थ प्रकाश मे स्वामी दयानंद माता-पिता बालक को कौनसी उत्तम शिक्षा करे इस विषय मे कहते है.
#उपस्थेन्द्रिय से स्पर्श और मर्दन से विर्य कि क्षीणता नपुंसकता होती है.
और हस्त मे दुर्गंध भी होता है इससे उसका स्पर्श न करे.
(सत्यार्थ प्रकाश,पृष्ठ 34)
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यहा कोई आर्य समाजी तर्क वितर्क करके ये घोषीत कर सकता है हम 18 साल के उमर तक बालक होते है. यहा 12 से 18 साल तक के उमर के बालक कि बात हो रही है.
लेकिन ध्यान से पढे पुरे पेज को
जहा ये बात लिखी है उसके उपर के पैराग्राफ मे दुध पिने वाले बालक कि बात हो रही है और निचे के पैराग्राफ मे 5 साल के लडके कि बात हो रही है.
अतः ये सिद्ध है कि स्वामी दयानंद ने विर्य संबंधीत जो बात लिखी है वह 5 साल या उससे छोटे बालक के लिए हि लिखी है.
अब आर्य समाजी हमे बताये क्या 5 साल के बालक के लिंग से विर्य निकल सकता है ?
क्या वो अपने घर के बालक को 5 साल कि उमर मे वो शिक्षा देंगे जो सत्यार्थ प्रकाश मे स्वामी दयानंद ने बतायी है ?
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क्या रामायण बुद्ध के बाद की रचना है?
वाल्मीकि रामायण में जब हमुमान लंका में सीता जी की खोज करते हुए जाते हैं तो वो लंका का वैभव देख आश्चर्य करते हुए कहते हैं -
स्वर्गोस्य देवलोकाsयमिन्द्रस्येयं पूरी भवते ( वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड ,सर्ग -9 श्लोक 31)
हमुमान लंका को स्वर्ग के समान कहते ,इंद्रलोक के जैसा वैभवशाली कह आश्चर्यचकित हो उठते हैं।
अब जानिए की लंका इंद्रलोक या स्वर्ग की तरह वैभवशाली क्यों थी। वाल्मीकि रामायण फिर कहती है -
' भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि'( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं ।
चैत्य शब्द वाल्मीकि रामायण में बहुत बार आया है , अयोध्याकाण्ड में ही कम से कम तीन बार आ गया है।
अब जानिए चैत्य शब्द का अर्थ-
चैत्य- बुद्ध मंदिर ( संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ पेज 440)
चैत्य- चैत्यमायतने बुद्ध बिम्बे( मेडिनिकोष)
अर्थात चैत्य ,बौद्ध मंदिर को कहते हैं।
कहने का अर्थ हुआ की लंका निश्चय ही बौद्ध नगरी रही होगी जंहा बौद्ध चैत्य बहुतायत थे ।
इसके अलावा , अयोध्या कांड सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में कहा गया है-
'यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् '
जिसका अर्थ गीता प्रेस की वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार दिया है- जिस प्रकार चोर दंडनीय होता है उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध( बौद्ध मतावलंबी ) भी।
इसके अलावा 15 वीं शताब्दी के गोविंराजकृत व्याख्या में इस श्लोक में आये शब्द 'तथागत ' की व्याख्या करते हुए कहते हैं ' तथागत बुद्धतुल्यम'
अर्थात तथागत का अर्थ बुद्ध जैसा किया है।
सुरेंद्र कुमार शर्मा (अज्ञात) पुरातत्व वैज्ञानिक ई.बी. कॉडवेल का हवाला देके बताते हैं कि सुंदर कांड ,सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है ,जो अश्वघोष रचित ' बुद्धचरितम( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक ।
रामायण में छेद वाली कुल्हाड़ी का जिक्र है, प्रसिद्ध पुरातत्व वैज्ञानिक डाक्टर हँसमुख धीरजलाल सांकलिया ने निष्कर्ष निकाला है कि ईसा पूर्व 300 से 500 से पहले भारत में छेद वाली कुल्हाड़ी का प्रयोग नहीं होता था।
तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि रामायण का पात्र रावण दरसल बौद्ध अनुयायी था ? और रामायण की रचना बुद्ध के बहुत बाद की है? शायद पहली ईसा से कुछ पहले या बाद की ? तब जब लंका में बौद्ध धर्म पूर्ण रूप से स्थापित हो चुका था ।
भाषा वैज्ञानी आदरणीय Rajendra Prasad Singh जी के अनुसार-
यदि मेजर फोर्ब्स पर यकीन करें तो प्राचीन भारत का कालक्रम कुछ ऐसे बनता है:-
#आरंभिक हड़प्पा सभ्यता :3500 ई.पू.
#क्रकुच्छंद बुद्ध का काल :3101 ई.पू.
#कोनागमन बुद्ध का काल : 2099 ई.पू.
#कस्सप बुद्ध का काल : 1014 ई. पू.
#गौतम बुद्ध का काल : 563 ई. पू.
संदर्भ : जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी,अंक जून, 1836
-संजय कुमार
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मासिक धर्म के पर अमानविय नियम 👉 पराशर स्मृती
पराशर स्मृती के लेखक का कहना है कि 👇
यदि ब्राह्मणी रजस्वला किसी दुसरी रजस्वला ब्राम्हणी को छुले वे तो उन रजोधर्म के तिन दिनो तक बिना भोजन किये हि रहे तो तिन दिनो मे शुद्ध होती है.
निचे के श्लोको मे क्षत्रिय वैश्य शुद्र स्त्रीयो के बारे मे नियम है
(पराशर स्मृती,अनुवाद गुरुप्रसाद शर्मा,पृष्ठ 54)
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शुद्ध अशुद्ध के नाम पर किसी स्त्री को तिन दिन तक भुखा रखना आपकी कौनसी महान सभ्यता है ?
वो भूखी रहे इससे स्मृती लेखक को कोई फर्क नही पडता बस वो तिन दिन मे शुद्ध होनी चाहिए
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Amoghavarsh Deval-Raje
क्या मनुस्मृति मे उसी तरह के वाक्य होने चाहिए जो तुम चाहते हो और तभी उसे प्रमाण माना जाय ?
मनुस्मृति 8/413 मे स्पष्ट लिखा है कि शुद्र को ब्रह्मा ने ब्राह्मण कि सेवा के लिए तयार किया है...
ये तो प्रबल प्रमाण है वर्णव्यवस्था जन्म आधारीत होने का.
यदि वो दुसरे वर्ण मे आयेगा तो वो काम कौन करेगा जिसके लिए ब्रह्मा ने शुद्र को बनाया है ?
आर्य समाजी 8/317,319 को प्रक्षिप्त मानते है ये तो हमे पहले से हि पता था.
और इसका जिक्र हमने अपने पहले पोस्ट के अंत मे हि किया था.
यदि आप किसी विवादित श्लोक को प्रक्षिप्त मानते हो तो ये आपका व्यक्तीगत मत हो सकता है इसे खंडन कहने कि कुचेष्टा ना करे.
क्योंकी हमने जिस श्लोक के आधार पर आक्षेप किया है वो श्लोक तो मनुस्मृति के सबसे प्राचिन भाष्य मेधातिथि भाष्य मे भी है.
मेधातिथि,कुल्लुक भट,नंदन,सर्वंजनारायण,रामचंद्र,रघुनंदन किसी भाष्यकार को ये श्लोक प्रक्षिप्त नही लगा है.
देखे मनुस्मृति 6 टिकाओ सहित, पृष्ठ 1268
क्या आपके पास कोई प्राचिन या मध्यकालीन आचार्य का भाष्य है जिसमे ये विवादित श्लोक नही ?
मेधातिथि से लेकर 21 वी सदी तक के आचार्य ने इस श्लोक को प्रक्षिप्त नही माना है क्या वो सब वेदोको नही पढते थे ?
अब रही बात परस्पर विरोधी श्लोको कि तो ये आपके सभी ग्रंथो कि विशेषता है.
इसका मतलब ये नही कि आप 2 परस्पर विरोधी श्लोको मे से किसी 1 विवादित श्लोक को प्रक्षिप्त घोषीत कर दो.
ये ग्रंथ लेखक के बुद्धी का दोष है.
कोई श्लोक अगर प्रकरण से संबंधीत नही है तो भी ये ग्रंथ लेखक के बुद्धी का दोष है.
हमने जिस श्लोक के आधार पर आक्षेप किया है वो श्लोक आर्य समाज कि तथाकथित विशुद्ध मनुस्मृति को छोड कर लगभग सभी मनुस्मृति मे है.
इसलिए हम अपनी बात पर अब भी कायम है.
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जो लोग कहते है वर्णव्यवस्था कर्म के आधार पर थी वो मनुस्मृति के कुछ श्लोक देखे.
शुद्र खरीदा हुआ हो अथवा ना हो उससे नोकर का काम ले क्योंकी ब्रह्माने ब्राह्मण की सेवा के लिए हि उसे बनाया है.
(मनु 8/413)
समीक्षा : यदि आपकी मनुस्मृति कह रही है कि ब्रह्माने ब्राह्मण कि सेवा के लिए शुद्र को बनाया है तो उसे कर्म के आधार पर दुसरे वर्ण मे लाना ब्रह्मा के नियम का उल्लंघन करने जैसा नही है क्या ?
अब आगे देखे....
वेद-विधीसे स्थापित हो या न हो अग्नी जैसे महान देवता है वैसे ब्राह्मण मुर्ख हो या विद्वान वह महान देवता है.
(मनु 9/317)
समीक्षा : इस श्लोक से तो आपकी कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था पुरी तरह से ध्वस्त हो रही है.
मनु स्पष्ट कह रहा है कि कोई ब्राह्मण मुर्ख भी होगा तो भी वह महान देवता है.
उस मुर्ख ब्राह्मण को मनुने शुद्र क्यों नही माना है ?
एक और श्लोक देखे.....
सब बुरे कर्मो मे प्रवृत्त रहने पर भी ब्राह्मण सर्वथा पुज्य है क्योंकी वे पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ देवता है.
(मनु 9/319)
समीक्षा: अब इसपर क्या तर्क वितर्क करोगे आर्य समाजीओ ?
या फिर बचने का कोई रास्ता ना मिलने के कारण श्लोक को प्रक्षिप्त घोषीत कर दोगे.
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गोरा और 100 वर्ष तक जिने वाला पुत्र प्राप्त करने के उपाय 👉 बृहदारण्यकोपनिषद
अभी तक हमने आर्य समाजी और हिंदुत्ववादीओ के मुह से ये बाते सुनी होगी कि वैदिक काल का विज्ञान आधुनिक विज्ञान से भी उन्नत था.
लेकिन आज आर्य समाजी और हिंदुत्ववादीओ के दावे प्रमाण मुझे बृहदारण्यकोपनिषद मे मिल गया.
बृहदारण्यकोपनिषद मे लिखा है ...
जो पुरुष चाहता हो कि मेरा पुत्र #शुक्ल_वर्णका हो,एक वेद का अध्ययन करे,और पुरे सौ वर्षोकी आयुतक जिवित रहे,उस दशा मे वे दोनो पति-पत्नि #दुध और #चावल को पका कर खिर बना ले.
और उसमे #घी मिलाकर खाये.
इससे वे उपयुक्त योग्यता वाले पुत्र को उत्पन्न करने मे समर्थ होते है.
(बृहदारण्यकोपनिषद 6-4-14,शंकरभाष्य,गिताप्रेस पृष्ठ 1351)
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उपर के श्लोक पर 5 वी मे पढने वाला विद्यार्थी भी बहोत सारे आक्षेप कर सकता है.
इसलिए हम समय के कमी के कारण अपने आक्षेप नही लिख रहे है
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ये खंडन है तो मूर्खता क्या है ?
इस पोस्ट को खंडन कि श्रेणी मे रखोगे तो धुर्तता के श्रेणी मे कौनसा पोस्ट रखोगे ?
असल मे कोई खंडन ना होकर हेत्वाभास मात्र है.
कल मैने छांदोग्य उपनिषद से दिखा दिया था कि वर्णव्यवस्था कर्म आधारीत ना होकर जन्म आधारीत है.
इसपर एक आर्य समाजी ने खंडन के नाम पर हेत्वाभासी उत्तर लिखा जिसकी समिक्षा आज हम करेंगे
उपनयन से कोई वर्ण निश्चित नही होता था उपनयन केवल गुरुकुल मे प्रवेश के लिए होता था.
वर्ण तो जन्म से हि निश्चित होता है.
इसलिए मनु अध्याय 2/31,32 किस वर्ण के बालक का नाम कैसा होना चाहिये ये पहले से हि तय किया है.
ब्राह्मण का मंगल सुचक शब्द से युक्त,क्षत्रिय का बलसूचक शब्दसे युक्त,वैश्य का धनवाचक शब्द से युक्त और शुद्र का निंदित शब्द से युक्त नामकरण करना चाहिए.
(मनुस्मृति 2/31)
: ब्राह्मण का शर्मा शब्द से युक्त,क्षत्रिय का रक्षा शब्द से युक्त,वैश्य का पुष्टी शब्द से युक्त और शुद्र का प्रेष्य(दास) शब्द से युक्त नाम रखना चाहिए.
(मनुस्मृति 2/32)
(ध्यान रहे उपर के दोनो श्लोको को ना तुलसीराम ने प्रक्षिप्त माना है ना सुरेंद्र कुमार ने.
आर्य समाजी चेक करके देखे)
जब वर्ण व्यवस्था कर्म के आधार पर है तो बचपन मे हि सभी वर्णो को अलग अलग नाम रखने का नियम क्यों है ?
क्या मा-बाप को बचपन मे हि पता चल जाता था ये ब्राह्मण या शुद्र बनने वाला है ?
कम से कम अगर ब्राह्मण का बालक या शुद्र का बालक ऐसा वाक्य होता तो आर्य समाजी तर्क-वितर्क करके बच सकते थे.
लेकिन मनु ने (2/32) मे साफ कहा है
ब्राह्मण का शर्मा शब्द से युक्त,क्षत्रिय का रक्षा शब्द से युक्त,वैश्य का पुष्टी शब्द से युक्त और शुद्र का प्रेष्य(दास) शब्द से युक्त नाम रखना चाहिए.
यहा बचपन मे हि ब्राह्मण को ब्राह्मण माना गया है और शुद्र को शुद्र.
अब रही बात उपनयन कि तो वो भी केवल द्विजो का होता था.
ब्राह्मण का गर्भ से आठवे वर्ष में,क्षत्रिय का गर्भ से ग्याहरवें वर्ष में और वैश्य का गर्भ से बाहरवें वर्ष मे उपनयन संस्कार करना चाहिए.
(मनु 2/36)
यहा शुद्र के उपनयन कि बात हि नही है.
उपनयन के बिना वो गुरूकुल मे प्रवेश हि नही कर सकता.
गुरुकुल मे ज्ञान प्राप्त किये बिना वो खुदको कर्म के आधार पर खुदको ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कैसे सिद्ध करेगा ?
36 वे श्लोक मे स्पष्ट लिखा है ब्राह्मण का गर्भ से 8 वे वर्ष मे उपनयन संस्कार करना चाहिए.
8 वर्ष के बालक मे वो कौनसे लक्षण दिखाई दिये आपको जिससे उसे ब्राह्मण घोषीत कर दिया ?
निचे हेत्वाभासी उत्तर मे छांदोग्य उपनिषद का श्लोक (5-10-7) कि गलत व्याख्या कि गई
इस आर्य समाजी का कहना है कि उत्तम वर्ण के परिवार मे जन्म होनेपर संस्कार अधीक होने कि संभावना है.
क्यों?
क्या शुद्र मा-बाप अपने बच्चे पर अच्छे संस्कार करने मे असमर्थ थे ?
यदि अच्छे संस्कार करने वाले मा बाप सभी वर्णो मे थे तो योनी पर वर्ण का लेबल क्यों लगाया गया है ?
यही तो समस्या है आपकी कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था सिर्फ कर्म तक सिमीत ना रहकर हर जगह घुस जाती है जहा उसकी जरुरत भी नही.
सुबह लेकर शाम ताक छोटी छोटी बातो मे भी किसी वर्ण के व्यक्ती को क्या करना चाहिए इसके भी नियम है मनुस्मृति मे.
ये सब क्यों है आपकी कर्म आधारीत व्यवस्था कर्म तक सिमीत क्यों नही है ?
छांदोग्य उपनिषद ने तो घोषीत कर दिया है कि पिछले जन्म के कर्म के कारण चांडाल योनी मे जन्म होता है.
अगला और पिछला जन्म किसने देखा है हो सकता है छांदोग्य 5-10-7 का ये श्लोक शुद्रो का विद्रोह दबाने के लिए लिखा गया हो .
तुम पिछले जन्म के कर्म के कारण शुद्र/चांडाल जन्मे हो इसलिए तुम्हे अन्याय अत्याचार सहना हि होगा तभी अगला जन्म अच्छा मिलेगा ये बात शुद्रो के दिमाग मे डालने के लिए ये श्लोक लिखा गया था.
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कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था का भांडा फोड
(छांदोग्य उपनिषद से प्रमाण)
छांदोग्य उपनिषद के अनुसार 👇
जिनका बर्ताव यहा रमणीय रहा है वह जल्दी उत्तम जन्म को प्राप्त होंगे. ब्राह्मण के जन्म को,वा क्षत्रिय के जन्म को वा वैश्य के जन्म को.
पर वह जो यहा निच बर्ताव वाले रहे है वो जल्दी निच योनी मे प्राप्त होंगे.
कुत्ते कि योनीको वा सुअर कि योनीको वा चांडाल कि योनीको.
(छांदोग्य उपनिषद 5-10-7, पंडित राजाराम,पृष्ठ 193)
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छांदोग्य उपनिषद का उपर का श्लोक आर्य समाज के तथाकथित कर्म आधारीत वर्ण व्यवस्था को पुरी तरह से ध्वस्त कर रहा है.
कोई शुद्र,चांडाल कर्म के आधार पर ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य कैसे बन सकता है ? वो तो पिछले जन्म के कर्म का फल भोगने के लिए चांडाल योनी को प्राप्त हुआ है.
उसे इस जन्म मे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य बनाना छांदोग्य उपनिषद के कर्म फल सिद्धांत कि काट करने जैसा है
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क्या सिर्फ युधिष्ठीर द्रौपदीका पति था ?
आर्य समाजीओ के अनुसार द्रौपदी के 5 पति ना होकर केवल युधिष्ठीर उसका 1 पति था.
भले हि आर्य समाजीओ ने 85 हजार से 90 हजार श्लोक को प्रक्षिप्त घोषीत कर के अपने संस्करण से हटा दिया है
लेकिन उनके द्रौपदी का 1 पति होने के दावे खंडन गिताप्रेस और अन्य प्रकाशनो कि महाभारत मे उपलब्ध है.
आदिपर्व 190 के 16 वे श्लोक मे आता है 👇
द्रौपदीको लेकर सब भाईयो मे फुट ना पड जाये इस भयसे राजाने अपने सभी बंधुओ से कहा कल्याणमयी द्रोपदी हम सब लोगों की पत्नी होगी.
(गिताप्रेस,महाभारत आदिपर्व, पृष्ठ 551)
एक और प्रमाण देखे
कुंती द्रौपदी को आशिर्वाद देते हुये कहती है 👇
जैसे इंद्राणी इंद्र मे,स्वाहा अग्नी मे,रोहिणी चंद्रमा मे,दमयंती नल मे,भद्रा कुबेर मे,अरुंधती वसिष्ट मे तथा लक्ष्मी नारायण मे भक्तीभाव एव प्रेम रखती है,उसी तरह तुम अपने पतीओ मे उसी तरह तुम भी अपने पतीओ मे अनुरक्त रहो.
(आदीपर्व 198, श्लोक 5/6)
यहा पती कि जगह पतीयों मे (अनेकवचनी शब्द है)
ये भी एक प्रमाण है कि द्रोपदी के 5 पती थे.
इतना हि नही आदिपर्व 220 मे किस पति से कौनसा पुत्र उत्पन्न हुआ इसका भी उल्लेख है
युधिष्ठीर और द्रौपदी का पुत्र प्रतिविंध्य,भिमसेन और द्रौपदी का पुत्र सुतसोम,अर्जुन और द्रौपदी का पुत्र श्रुतकर्मा,नकुल और द्रौपदी का पुत्र शतानीक तथा सहदेव और द्रौपदी का पुत्र श्रुतसेन.
इन पाच महारथी पुत्रो को द्रौपदी ने उसी प्रकार जन्म दिया जैसे आदितिने बारा आदित्योको
(महाभारत,आदिपर्व 220, श्लोक 79/80)
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इन सब प्रमाणो से सिद्ध है कि द्रौपदी के 1 नही 5 पांडव पति थे.
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पत्नीको सेक्स के लिए तयार करने के उपाय 👉 बृहदारण्यकोपनिषद
अगर किसी व्यक्ति कि पत्नी सेक्स के लिए मना करती है तो बृहदारण्यकोपनिषद लेखन ने पत्नी को सेक्स के लिए तयार करने के उपाय बताये है.
👇
वह #पत्नी यदि पती को #मैथुन न करने दे तो पती उसे उसके इच्छा के अनुसार वस्त्र,आभुषण आदी देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे.
इतनेपर भी यदि वह उसे मैथुन का अवसर न दे तो वह पती इच्छानुसार दण्ड का भय दिखाकर उसके साथ #बलपुर्वक #समागम करे. यदि यह भी संभव न हो तो कहे मै तुझे शाप देकर #दुर्भगा(बन्ध्या) बना दुंगा ऐसा कह कर वह उसके निकट जाये और मै अपनी यशः स्वरुप इंद्रियद्वारा तेरे यशको छिने लेता हु.
इस मंत्रका उच्चारण करे.
इस प्रकार शाप देणेपर वह #बन्ध्या अथवा दुर्भगा हो हि जाती है
(गिताप्रेस गोरखपूर,उपनिषद भाष्य खंड 4, बृहदारण्यकोपनिषद शंकर भाष्य 6/4/7)
नोट : पृष्ठ 1344 पर शंकराचार्य भाष्य है वो भी देखे..........
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बृहदारण्यकोपनिषद लेखक के इस नेक सलाह मे कौनसा विज्ञान,अध्यात्मवाद,तत्वज्ञान है ?
पत्नी के साथ बलपुर्वक सेक्स करने कि शिक्षा देना क्या योग्य है ?
शायद वैदिक मत के अध्यात्मवाद मे ये पुण्यकर्म हो....
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पत्नीको सेक्स के लिए तयार करने के उपाय 👉 बृहदारण्यकोपनिषद
अगर किसी व्यक्ति कि पत्नी सेक्स के लिए मना करती है तो बृहदारण्यकोपनिषद लेखन ने पत्नी को सेक्स के लिए तयार करने के उपाय बताये है.
👇
वह #पत्नी यदि पती को #मैथुन न करने दे तो पती उसे उसके इच्छा के अनुसार वस्त्र,आभुषण आदी देकर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट करे.
इतनेपर भी यदि वह उसे मैथुन का अवसर न दे तो वह पती इच्छानुसार दण्ड का भय दिखाकर उसके साथ #बलपुर्वक #समागम करे. यदि यह भी संभव न हो तो कहे मै तुझे शाप देकर #दुर्भगा(बन्ध्या) बना दुंगा ऐसा कह कर वह उसके निकट जाये और मै अपनी यशः स्वरुप इंद्रियद्वारा तेरे यशको छिने लेता हु.
इस मंत्रका उच्चारण करे.
इस प्रकार शाप देणेपर वह #बन्ध्या अथवा दुर्भगा हो हि जाती है
(गिताप्रेस गोरखपूर,उपनिषद भाष्य खंड 4, बृहदारण्यकोपनिषद शंकर भाष्य 6/4/7)
नोट : पृष्ठ 1344 पर शंकराचार्य भाष्य है वो भी देखे..........
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बृहदारण्यकोपनिषद लेखक के इस नेक सलाह मे कौनसा विज्ञान,अध्यात्मवाद,तत्वज्ञान है ?
पत्नी के साथ बलपुर्वक सेक्स करने कि शिक्षा देना क्या योग्य है ?
शायद वैदिक मत के अध्यात्मवाद मे ये पुण्यकर्म हो....
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वाल्मिकी रामायण मे सिता के स्तनो का वर्णन
रावण द्वारा सिता हरण के बाद राम विलाप करते हुये लक्ष्मण से कहते है 👇
मेरी प्रिया के वे दोनो #गोल गोल #स्तन जो सदा लाल #चंदनसे चर्चित होने योग्य थे वो #रक्त कि किचमें सन गये होंगे.
हाय..! इतनेपर भी मेरे शरीर का पतन नही होता.
(वाल्मिकी रामायण,अरण्यकांड 63, श्लोक आठ)
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ऋग्वेद का विचित्र खगोलविज्ञान
आर्य समाजी कहते है कि वेदो मे आज आधुनिक विज्ञान से भी ज्यादा विकसित विज्ञान है.
देखीये ऋग्वेद का खगोलविज्ञान क्या कहता है.
दिप्तीमान और सर्वप्रकाशक सुर्य! हरित् नाम के सात #घोडे रथ मे तुम्हे ले जाते है.किरणे हि तुम्हारे #केश है.
(मंत्र 8)
(इस मंत्र के अनुसार सुर्यदेव 7 घोडो के रथ मे बैठकर गतीमान है.प्रकाश उसके केश(बाल)है )
सुर्य ने रथवाहिका सात #घोडीयों को #रथ मे संयोजित किया.
उन संयोजित घोडीयों द्वारा सुर्य गमन करते है. (मंत्र 9)
(इंडियन प्रेस,(पब्लिकेशन्स),प्रयाग,ऋग्वेद सायणभाष्य हिंदी अनुवाद,पंडित रामगोविंद त्रिवेदी,पृष्ठ 67)
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आधुनिक विज्ञान कहता है हमारे सौरमंडल मे सुर्य स्थिर है और पृथ्वी समेत अन्य ग्रह सुर्य कि परिक्रमणा करते है.
वेदो के अनुसार सुर्य सात घोडो के रथ मे बैठकर गतीमान है.
इससे सिद्ध होता है कि वेद लिखने वालो को आधुनिक विज्ञान तो क्या प्राथमिक विज्ञान कि भी जानकारी नही थी.
वेदो मे प्रकाश को सुर्य के केश(बाल) भी कहा गया है,जबकी ऐसा नही है.
प्रकाश सुर्य के बाल ना होकर फोटाॅन कण होते है.
लेकिन ये बात वेद लिखने वाले आर्यो को नही पता थी.
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कृष्णकी 16 हजार राणीओ का प्रमाण महाभारत से 👇
आर्य समाजी कहते है कि पौराणीको ने कृष्ण का चरित्र दुषित किया महाभारत से कृष्ण के चरित्र मे कोई दोष नही दिखाये जा सकते.
आर्य समाजी हिंदुओ से महाभारत कि कथाये छुपाने चाहते है या उन्होने महाभारत ठिक से पढी नही नही है
कृष्ण कि 16 हजार राणीओ का उल्लेख सिर्फ पुराणो मे हि नही महाभारत मे भी है.
श्रीकृष्ण ने शिव पार्वतीसे 8 वरदान मांगे थे, जिसे आप 6 वे श्लोक मे देख सकते है.
अमरोंके समान प्रभावशाली श्रीकृष्ण ! ऐसा हि होगा !
मै कभी झुठ नही बोलती हु !
तुम्हे #सोलह #हजार रानीया होगी,उनका तुम्हारे प्रती प्रेम रहेगा,तुम्हे अक्षय धनधान्य कि प्राप्ती होगी बंधु-बांधवो कि ओर से तुम्हे प्रसन्नता होगी,
मै तुम्हारे इस शरीर को सदा कमनीय बने रहनेका वर देती हु!
(महाभारत, अनुशासनपर्व 15, श्लोक 7/8, हिंदी अनुवाद रामनारायणदत्त शास्त्री, पृष्ठ 5507)
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कमनीय बने रहने का मतलब हमेशा सेक्स कि इच्छा मन मे रहे.
इस शब्द का अलग अर्थ नही लिया जा सकता क्योंकी 6 वे श्लोक मे श्रीकृष्ण स्पष्ट वरदान मांग रहे है कि
उत्तम #भोग सदा उपलब्ध रहे.
भोग संभोग ये सब सेक्स के लिये आये शब्द है.
अंतः ये सिद्ध है कि श्रीकृष्ण कि 16 हजार राणीओ का उल्लेख महाभारत मे भी है.
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