महात्मा बुद्ध और वेद
(बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर प्रकाशित)
विद्वा च वेदेहि समेच्च धम्मम । न उच्चावच्चं गच्छति भूरिपज्जो ।। ( सुत्तनिपात श्लोक २९२ )
अर्थात महात्मा बुद्ध कहते हैं – जो विद्वान वेदों से धर्म का ज्ञान प्राप्त करता है, वह कभी विचलित नहीं होता ।
विद्वा च सो वेदगु नरो इध भवाभावे संगम इमं विसज्जा । सो वीततन्हो अनिघो निरासो अतारि सो जाति जरान्ति ब्रूमिति ।। ( सुत्तनिपात श्लोक १०६० )
अर्थात वेद को जानने वाला विद्वान इस संसार में जन्म या मृत्यु में आसक्ति का परित्याग करके और तृष्णा तथा पापरहित होकर जन्म और वृद्धावस्थादि से पार हो जाता है ऐसा मैं कहता हूँ ।
ने वेदगु दिठिया न मुतिया स मानं एति नहि तन्मयो सो । न कम्मुना नोपि सुतेन नेयो अनुपनीतो सो निवेसनूसू ।। ( सुत्तनिपात श्लोक ८४६ )
अर्थात वेद को जानने वाला सांसारिक दृष्टि और असत्य विचारादि से कभी अहंकार को प्राप्त नही होता । केवल कर्म और श्रवण आदि किसी से भी वह प्रेरित नहीं होता । वह किसी प्रकार के भ्रम में नहीं पड़ता ।
यो वेदगु ज्ञानरतो सतीमा सम्बोधि पत्तो सरनम बहूनां । कालेन तं हि हव्यं पवेच्छे यो ब्राह्मणो पुण्यपेक्षो यजेथ ।। ( सुत्तनिपात श्लोक ५०३ )
अर्थात जो वेद को जानने वाला,ध्यानपरायण, उत्तम स्मृति वाला, ज्ञानी, बहुतों को शरण देने वाला हो जो पुण्य की कामना वाला यग्य करे वह उसी को भोजनादि खिलाये।
उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि महात्मा बुद्ध वैदिक आर्य जनों को आदर्श मानते थे। अब बुद्धजीवी यह विचार करें कि महात्मा बुद्ध के उपदेशों का विरोध करने वाले व्यक्ति बौद्ध कैसे हो सकते हैं ???
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