दूसरे शब्दों में, क़ुरआन ख़ुद इस बात की दलील है कि वह ख़ुदा की किताब है, वह एक ईश्वरीय ग्रंथ है। उसके बहुत से पहलू हैं, पर मैं यहां उसके सिर्फ़ तीन पहलूओं का उल्लेख करूंगा। एक, उसकी असाधारण शैली। दूसरे, उसके अर्थ में विरोधाभास (contradiction) का न होना। और तीसरे, उसकी शाश्वतता!
*क़ुरआनः अपनी दलील आप*
1. क़ुरआन एक ग़ैरमामूली (असाधारण) कलाम है। उसको पढ़ते हुए साफ़ मालूम होता है कि उसका लेखक एक ऐसे ऊंचे स्थान से बोल रहा है, जो किसी भी आदमी को हासिल नहीं। उसकी अभिव्यक्ति की गरिमा, उसकी बेपनाह रवानी (प्रवाहशीलता) उसका बेलाग बयान आश्चर्यजनक हद तक मानवीय वाणी से इस क़दर भिन्न है कि साफ़ तौर पर मालूम होता है कि यह सृष्टि के मालिक की आवाज़ है, वह किसी इंसान की आवाज़ नहीं। उसकी विश्वास भरी और गरिमापूर्ण वाणी ख़ुद बोल रही है कि यह ईश्वर की किताब है, जिसमें ईश्वर अपने बंदों और अपनी बंदियों को संबोधित कर रहा है। यहां मैं नमूने के तौर पर क़ुरआन के एक अध्याय (नं. 82) का अनुवाद पेश करूंगा-
‘‘जब आसमान फट जाएगा, जब सितारे बिखर जाएंगे, जब दरिया उबल पड़ेंगे, जब क़ब्रें उलट दी जाएंगी, उस दिन हर शख़्स जान लेगा जो उसने आगे भेजा और जो उसने पीछे छोड़ा। ऐ इंसान, तुझको अपने मालिक के बारे में किस चीज़ ने धोखे में डाल रखा है, जिसने तुझे बनाया, तेरी सूरत ठीक-ठीक और संतुलित बनाई। उसने जिस सूरत में चाहा, वैसा तुमको बनादिया। नहीं, बल्कि तुम फ़ैसले के दिन का इंकार करते हो। हालांकि तुम्हारे ऊपर नज़र रखने वाले (फ़रिश्ते) तैनात हैं, सही-सही लिखने वाले। वे जानते हैं, जो तुम करते हो। यक़ीनन अच्छे लोगों के लिए नेमतें (वरदान) हैं और यक़ीनन बुरे लोगों के लिए जहन्नम है। वे फ़ैंसले के दिन उसमें डाले जाएंगे, और वे
हरगिज़ उससे भाग नहीं सकते। और क्या तुम जानते हो कि फ़ैसले का दिन क्या है। फिर क्या तुम जानते हो कि फ़ैसले का दिन क्या है। वह एक ऐसा दिन है जब कोई किसी के काम न आएगा। उस दिन सिर्फ़ ख़ुदा का हुक्म चलेगा।’’
किस क़दर विश्वास से भरा है यह कलाम, जिसमें ज़िंदगी का आरंभ और अन्त सब कुछ बयान कर दिया गया है। कोई भी मानवीय पुस्तक, जो जीवन और सृष्टि के बारे में लिखी गई हो, इस विश्वास और यक़ीन की मिसाल पेश नहीं कर सकती। सैकड़ों वर्षों से आदमी सृष्टि की हक़ीक़त पर विचार कर रहा है, बड़े-बड़े दार्शनिक और वैज्ञानिक पैदा हुए, पर कोई इतने विश्वास के साथ बोलने का साहस न कर सका। विज्ञान आज भी यह मानता है कि वह किसी निश्चित ज्ञान से बहुत दूर है, जबकि क़ुरआन इतने विश्वास के साथ बात कहता है जैसे वह सच्चाई से आख़िरी हद तक वाक़िफ़ है।
2. क़ुरआन के ईश्वरीय ग्रंथ होने की दूसरी दलील यह है कि उसने अलौकिक और प्राकृतिक विषय से लेकर, सांस्कृतिक समस्याओं तक, सारे महत्त्वपूर्ण विषय पर बातचीत की है, लेकिन कहीं भी उसके बयान में विरोधाभास (contradiction) नहीं पाया जाता। इस वाणी को आए हुए डेढ़ हज़ार साल बीत चुके हैं। इस दौरान बहुत सी नई-नई बातें आदमी को मालूम हुई हैं, पर क़ुरआन की बात में अब भी कोई विरोधाभास प्रकट नहीं हो सका, जबकि इंसानों में से किसी एक भी दार्शनिक का नाम इस हैसियत से नहीं लिया जा सकता कि उसकी बात विरोधाभास से ख़ाली हो। इस बीच हज़ारों दार्शनिक और चिंतक पैदा हुए, जिन्होंने अपनी बुद्धि से ज़िंदगी और सृष्टि की व्याख्या करने की कोशिश की, पर बहुत जल्द उनकी बातों में विरोधाभास प्रकट होने लगा और वक़्त ने उन्हें रद्द कर दिया।
क़ुरआन की शिक्षाओं को अगर आप मानवीय दर्शनों की तुलना में रखकर देखें तो आप उसमें इस तरह की बहुत-सी मिसालें पाएंगे।
किसी वाणी का विरोधाभास से ख़ाली होना इस बात का खुला हुआ सुबूत है कि वह पूरी तरह सच्चाई और वास्तविकता (reality) के अनुकूल है। जो आदमी सच्चाइयों का ज्ञान न रखता हो या सिर्फ़ आंशिक ज्ञान उसे हासिल हो तो वह जब भी सच्चाई को बयान करेगा, निश्चय ही वह विरोधाभास का शिकार हो जाएगा। वह एक पहलू की व्याख्या करते समय दूसरे पहलू का ख़्याल नहीं रख सकेगा। वह एक रुख़ को खोलेगा तो दूसरे रुख़ को बंद कर देगा। ज़िंदगी और सृष्टि की व्याख्या का सवाल एक शाश्वत और सर्वव्यापक सवाल है। उसके जवाब के लिए सारी सच्चाइयों का ज्ञान होना ज़रूरी है। और चूंकि आदमी अपनी सीमित क्षमताओं द्वारा सारी सच्चाइयों को नहीं जान सकता, इसलिए वह सारे पहलुओं का पूरा ध्यान नहीं रख सकता। यही कारण है कि आदमी के बनाए हुए दर्शन में विरोधाभास का होना निश्चित है। क़ुरआन की यह विशेषता है कि वह इस तरह के विरोधाभास से रहित है। यह इस बात की दलील है कि वह सच्चाई की सही-सही व्याख्या कर रहा है।
3. क़ुरआन की तीसरी विशेषता यह है कि वह लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष से धरती पर मौजूद है। इस दौरान कितनी क्रांतियां हुई हैं, इतिहास में कितनी उलट-पलट हुई है, कितने युग बदले हैं, वक़्त ने कितनी करवटें ली हैं, लेकिन आज तक क़ुरआन की कोई बात ग़लत साबित नहीं हुई। वह हर युग की बौद्धिक संभावनाओं और सांस्कृतिक व सामाजिक आवश्यकताओं का निरंतर साथ देता चला जा रहा है, उसकी शिक्षाओं की प्रासांगिकता और शाश्वतता कहीं भी ख़त्म नहीं होती, बल्कि वह हर युग की समस्याओं पर हावी होती चली जा रही है। यह क़ुरआन की एक ऐसी विशेषता है जो किसी भी मानवीय किताब में नहीं पाई जाती। मनुष्य का बनाया हुआ हर दर्शन चंद ही दिनों बाद अपनी ग़लती ज़ाहिर कर देता है। सदियों पर सदियां गुज़रती जा रही हैं, पर इस किताब की सच्चाई और प्रमाणिकता में कोई फर्क़ नहीं आया। वह पहले जिस तरह सत्य था, आज भी वह उसी तरह सत्य। है। क़ुरआन की यह विशेषता ज़ाहिर करती है कि वह एक ऐसे ज़हन से निकला हुआ कलाम है, जिसका ज्ञान अतीत से भविष्य तक फैला हुआ है। कुरआन की शाश्वतता उसके ईश्वरीय होने का खुला हुआ सुबूत है।
*आख़िरी बात*
हमारे अध्ययन ने अब हमारे लिए सत्य के दरवाज़े खोल दिए हैं। हमने अपनी यात्रा इस प्रश्न से शुरू की थी कि ‘‘हम क्या हैं और यह जगत क्या है?’’ इसका उत्तर बहुत से लोगों ने अपने ज़हन से देने की कोशिश की। पर हमने देखा कि ये उत्तर सच्चाई को प्रतिबिम्बित नहीं करते।
फिर हमारे कानों में अरब से निकली हुई एक आवाज़ आई, हमने उस पर ध्यान दिया, जगत के फ्रेम में उतर कर हमने उसको पहचानने की कोशिश की। हमने देखा कि सृष्टि, इतिहास और मनुष्य का मनोविज्ञान एकमत होकर इसकी पुष्टि कर रहे हैं। हमारा पूरा ज्ञान और हमारी तमाम उदात्त भावनाएं इसके पक्ष में हैं। जिस सच्चाई की हमें तलाश थी उसको हमने पा लिया। अब हमें यह फ़ैसला करना है कि हम उसके साथ कैसा बर्ताव करते हैं, हम उसको गंभीरता से लेते हैं, या नहीं।
Saturday, 24 April 2021
सत्य की खोज - मौलाना वहीदुद्दीन खान।
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