कल्कि अवतार चाहें जिनके लिए भी सुखद रहा हो, लेकिन श्रमणों के लिए वह काल बनकर आया…..
कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि अवतार हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर श्रमणों ( जैन – बौद्ध ) का नाश करेगा…..
जयदेव और चंडीदास ने लिखा है कि कल्कि अवतार हो चुका है…..
तब,कौन है कल्कि अवतार?
इतिहासकार के. बी. पाठक ने अपनी पुस्तक ” Commemorative Essays, New Light On Gupta Era And Mihirkula ” में लिखा है कि हूण सम्राट मिहिरकुल ही कल्कि अवतार है….
प्रमाण के तौर पर उन्होंने बताया है कि जैन आचार्य गुणभद्र ( 9 वीं सदी ) द्वारा वर्णित कल्किराज ही मिहिरकुल है…..
गुणभद्र के अनुसार कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के हजार साल बाद होगा….
मिहिरकुल ( 6 वीं सदी ) का आविर्भाव ठीक महावीर के निर्वाण के हजार साल बाद होता है…..
जिनसेन ने ” उत्तर पुराण ” में लिखा है कि कल्किराज 40 सालों तक शासन करेगा…..
मिहिरकुल ( 502 – 542 ई. ) ठीक 40 सालों तक शासन करता है….
जैन ग्रंथों के अनुसार कल्किराज का उत्तराधिकारी अजितांजय था और मिहिरकुल का भी उत्तराधिकारी अजितांजय ही था….
कोई शक नहीं कि मिहिरकुल का ही नाम श्रमण ग्रंथों में कल्किराज है…..
कल्किराज को श्रमण ग्रंथों ने भारी अत्याचारी और दुष्ट बताया है….
ह्वेनसांग ने लिखा है कि मिहिरकुल ने केवल गंधार प्रदेश में ही 1600 स्तूपों और संघारामों को नष्ट कर दिया था…..
न केवल बौद्ध ग्रंथों ने बल्कि जैन ग्रंथों ने भी कल्किराज के अत्याचार की अनेक बातें लिखी हैं….
मिहिरकुल के पिता का नाम तोरमाण था, ये लोग वाराहपूजक थे और यहीं कारण है कि तोरमाण ने एरण में वाराह की विशाल प्रतिमा स्थापित की…..
नीचे की तस्वीर एरण में स्थापित वाराह प्रतिमा की है, जिसकी छाती पर तोरमाण का नाम लिखा है…..
एरण का नाम विचारणीय है। एरण को अंग्रेजी में ” Eran ” लिखा जाता है और आश्चर्य कि मिडिल पर्शियन में ईरान को भी ” Eran ” लिखा जाता था….
पार्थियन शासकों के जमाने में ईरान के लिए एरान का प्रयोग किया गया है और भारत में एरण इसी की प्रतिच्छवि है….
मिहिरकुल हूणों की दूसरी शाखा का था और हूणों की दूसरी शाखा बहुत पहले ईरान में बस गई थी…..
छठी सदी में कल्कि अवतार हो चुका था, इसीलिए सातवीं सदी में पहली बार कलि संवत हमें मिलता है….
निष्कर्ष यह कि श्रमण युग को ही कलियुग के रूप में कल्पित किया गया है और श्रमण युग का अंत करना ही कल्कि अवतार का ध्येय था….
~ Dr. Rajender Prasad Singh
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