Saturday, 24 April 2021

मुहम्मद स. का आखिरी खुतबा। इस्लाम बुरा है तो फिर क्यों..।

चलिए आप… पैगंबर (Messenger ) मोहम्मद ( सल्ल. ) पर लिखी कोई किताब मत पढ़िए… बस दो मिनट का वक़्त दीजिए… और उनका आख़िरी ख़ुतबा (संदेश) पढ़ लीजिए…

“मैं जो कुछ कहूँ, ध्यान से सुनो! इंसानों तुम्हारा रब एक है। अल्लाह की किताब और उसके रसूल (स.अ.) की सुन्नत को मजबूती से पकड़े रखना।

लोगों की जान-माल और इज्जत का ख्याल रखना, न तुम लोगों पर ज़ुल्म करो, न क़यामत में तुम्हारे साथ ज़ुल्म किया जाएगा। कोई अमानत रखे तो उसमें खयानत न करना। ब्याज के करीब न फटकना।

किसी अरबी(अरब के निवासी) को किसी अजमी (गैर-अरबी) पर कोई बरतरी हासिल नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर। फज़ीलत अगर किसी को है तो सिर्फ तक़वा(ईशभय) व परहेज़गारी से है। रंग, जाति, नस्ल, देश, इलाके किसी के लिए बरतरी की बुनियाद नहीं है। बरतरी की बुनियाद अगर कोई है तो ईमान और उसका तक़वा है। जो कुछ खुद खाओ, अपने गुलामों को भी वही खिलाओ और जो खुद पहनो, वही उनको पहनाओ।

इस्लाम आने से पहले के सभी खून (हत्या) खत्म कर दिए गए, अब किसी को किसी से पुराने खून (हत्या) का बदला लेने का हक नहीं, और सबसे पहले मैं अपने खानदान का खून, रबिया इब्न हारिस का खून, खत्म करता हूँ (यानी उनके क़ातिलों को माफ़ करता हूँ)

पिछले दौर के सभी ब्याज (सूद) खत्म किये जाते हैं और सबसे पहले मैं अपने खानदान में से अब्बास इब्ने मुत्तलिब का ब्याज खत्म करता हूँ।

औरतों के मामले में अल्लाह से डरो, तुम्हारा औरतों पर और औरतों का तुम पर हक है। औरतों के मामले में तुम्हें वसीयत करता हूँ कि उनके साथ भलाई का रवैया अपनाओ।

लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं और तुम्ह्रारे बाद कोई उम्मत नहीं है। अपने रब की इबादत करना। रोजाना पंचों वक्त की नमाज़ पढना, रमजान के रोज़े रखना, ख़ुशी ख़ुशी अपने माल की जकात अदा करना। अपने रब के घर का हज करना और अपने हाकिमों का कहना मानना। ऐसा करोगे तो अपने रब की जन्नत में दाखिल होगे।

लोगों क्या मैंने तुम तक अल्लाह का पैगाम पहुंचा दिया।
लोगों की भारी भीड़ बोल उठी; हाँ, ए अल्लाह के रसूल।
तब मोहम्मद स.अ. ने तीन बार कहा, ए अल्लाह तू गवाह रहेगा। उसके बाद कुरान की यह आयत सुनाई।

“आज मैंने तुम्ह्रारे लिए दीन को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और तुम्हारे लिए दीने इस्लाम को पसंद किया। (कुरान: सुरह मायदा, आयत न 3)”
(सहीह बुखारी)

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